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रवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ Rabindranath Tagore ki Kahaniyan

Arpaa

हिन्दी भाषा में साहित्य का विशाल और समृद्ध खज़ाना लिखित रूप में मौजूद है। डिजिटल युग में बहुत ही दुर्लभ पुस्तकें भी स्कैन की हुई इंटरनेट पर मिल जाती हैं। e-library की स्थापना और डिजिटल संग्रह लगातार खुलते जा रहे हैं। लेकिन अंग्रेज़ी की तरह हिन्दी साहित्य अभी आडिओ रूप में बहुत ज़्यादा संख्या में नहीं है। इस संग्रह को बढ़ाने में मेरा एक छोटा सा सहयोग इस पॉडकास्ट के माध्यम से आपके पास तक पहुँच रहा है। कुछ बड़े, नामी पुराने साहित्यकारों की कहानियाँ, कुछ नए कहानीकारों की कहानियाँ सुनते रहिए….पॉडकास्ट सुनें कहानी संज्ञा से के माध्यम से।

रवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : धन का मोह  : Dhan ka mohरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : तोता : Totaरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : मुन्ने की वापसी : Munne ki Vapasiरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : अनाधिकार प्रवेश  : Anadhikar Praveshरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : खोया हुआ मोती  : Khoya hua motiरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : सुभाषिणी  : Subhashiniरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : काबुलीवाला : Kabuliwalaरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : वंशज दान : Vanshajdaanरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : कवि का हृदय : kavi ka hridayरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : अवगुंठन : Avgunthanरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : इच्छापूर्ण : Ichchpurnरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : मालादान : Maaladaanरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : कवि और कविता, Kavi aur Kavitaरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : अपरिचिता, Aparichita
विवाह की उम्र होने पर अपने भावी जीवन साथी के लिए मन में कल्पना होना हमेशा से लड़के और लड़की होता रहा है। पर पहले के ज़माने में बिना कन्या को देखे-मिले बुज़ुर्गों के आदेश पर विवाह हुआ करते थे। दान-दहेज के मामले भी बुज़ुर्ग अपने हिसाब से देखते थे। लेकिन क्या हमेशा वर पक्ष वाले ही सही होते हैं....क्या कन्या पक्ष वालों को कुछ बोलने का अधिकार नहीं हो सकता...उनकी नियति में सिर्फ सिर झुकाकर वर पक्ष की बातों को मानना ही होता है.....गुरुदेव ने अपने ज़माने की परिस्थितियों के अनुसार "अपरिचिता" कहानी लिखी थी, जो आज भी समसामायिक है। नायक के लिए कन्या अपरिचिता थी...क्या वो कभी परिचिता बन पायी....सुनें कहानी.....
25-08-2019
36 mins
रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ : कंचन, Kanchanरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : दीदी, Didiरवीद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ, छुट्टियों का इंतज़ार, Chutiyon ka intzarरवींद्र नाथ टैगोर की कहानियाँ : पिंजर, Pinjer,रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानियां : हेमू, Hemu,
रवीद्र नाथ टैगोर के उपन्यास, बड़ी व छोटी कहानियों में 'हेमू' को छोटी कहानियों के श्रेणी में रखा गया है। हर माता पिता अपनी बेटी को संस्कार देते हैं, हर खूबी को उसमें डालने की कोशिश करते हैं, पाल पोसकर तयार करके उसको दूसरे घर को समृद्ध करने के लिए दान कर देते हैं। अब ये हर लड़की की किस्मत कि उसको कैसा घर-परिवार-पति मिले। प्रस्तुत कहानी कि नायिका अपने पिता की चहेती शिशिर उर्फ हेमू भी कन्यादान के पश्चात दूसरे घर आई। पति उसको समझने वाला था, किन्तु परिवार के अन्य सदस्यों की नज़र में खरा उतरने के लिए उसने खुद को तपा डाला, अपनी भावनाओं को जला डाला, इच्छाओं को दफन कर दिया .....फिर भी क्या वो सामंजस्य बैठा पायी? अपने लिए खुशियाँ जुटा पायी? पति का साथ दे पायी?
21-07-2019
36 mins
रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानियां : अतिथि, Atithi
रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1940) उन साहित्य-सृजकों में हैं, जिन्हें काल की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। रचनाओं के परिमाण की दृष्टि से भी कम ही लेखक उनकी बराबरी कर सकते हैं। उन्होंने एक हज़ार से भी अधिक कविताएँ लिखीं और दो हज़ार से भी अधिक गीतों की रचना की। इनके अलावा उन्होंने बहुत सारी कहानियाँ, उपन्यास, नाटक तथा धर्म, शिक्षा, दर्शन, राजनीति और साहित्य जैसे विविध विषयों से संबंधित निबंध लिखे। उनकी दृष्टि उन सभी विषयों की ओर गई, जिनमें मनुष्य की अभिरुचि हो सकती है। कृतियों के गुण-गत मूल्यांकन की दृष्टि से वे उस ऊँचाई तक पहुँचे थे, जहाँ कुछेक महान् रचनाकर ही पहुँचते हैं। जब हम उनकी रचनाओं के विशाल क्षेत्र और महत्व का स्मरण करते हैं, तो इसमें तनिक आश्चर्य नहीं मालूम पड़ता कि उनके प्रशंसक उन्हें अब तक का सबसे बड़ा साहित्य-स्रष्टा मानते हैं।
14-07-2019
49 mins